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जानें महाशिवरात्रि क्या है और क्यों मनाते हैं?

Shivratri 2018: Date, Celebration And Significance

शिवरात्रि तो हर महीने में आती है। लेकिन महाशिवरात्रि साल में एक बार आती है। इस साल दिल्ली वालों के लिए यह 13 फरवरी यानी मंगलवार को है। अमावास्या के एक दिन या दो दिन पहले जो त्रयोदशी या चतुर्दशी की रात होती है, उसे हर महीने में शिवरात्रि माना जाता है लेकिन हम इनके ऊपर ध्यान नहीं देते। हम सिर्फ महाशिवरात्रि के ऊपर ध्यान देते हैं। इसके कई कारण हैं। महाशिवरात्रि ऐसे वक्त में आती है, जब जाड़े का मौसम जाने वाला होता है और गर्मी के दिन शुरू होने वाले होते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो मौसम अपना रुख बदल रहा होता है। इतना ही नहीं यह शिवरात्रि सूर्य के उत्तरायण होने के बाद आती है ।

शिवरात्रि का महत्व चंद्र से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि शिव की उपासना करके ही चंद्र को उस शाप से मुक्ति मिली थी, जो उन्हें दक्ष प्रजापति से मिला था। शाप की वजह से चंद्र अमावस्या के दिन ही मरने वाले थे लेकिन उन्होंने शिव की प्रार्थना शुक्ल पक्ष में की और वे बच गए। इसलिए शिवजी के बारे में कहते हैं कि शिव हमारी जिंदगी के कृष्ण पक्ष यानी दुखी संसार को शुक्ल पक्ष में बदल देते हैं। इसलिए हर महीने अमावस्या के एक-दो दिन पहले शिवरात्रि की पूजा करते हैं।

महाशिवरात्रि के साथ कुछ और खास बाते हैं। महाशिवरात्रि के समय न केवल कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष में पहुंचते हैं, बल्कि ऋतु भी बदलती है। इस तरह हम कह सकते हैं कि महीने का ही नहीं, बल्कि नए साल का शुक्ल पक्ष भी शुरू होता है।

कहते हैं कि महाशिवरात्रि के दिन शिवजी पहली बार प्रकट हुए थे। शिव का प्राकट्य ज्योतिर्लिंग यानी अग्नि के शिवलिंग के रूप में था। ऐसा शिवलिंग जिसका न तो आदि था और न ही अंत। कहते हैं कि ऐसे भव्य शिवलिंग को देखने से ब्रह्मा और विष्णु भी खुद को रोक नहीं पाए थे। ब्रह्मा जी हंस के रूप में शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग को देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन वह सफल नहीं हो पाए। वह शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग तक पहुंच ही नहीं पाए। दूसरी ओर भगवान विष्णु भी वराह का रूप लेकर शिवलिंग के आधार ढूंढ रहे थे लेकिन उन्हें भी आधार नहीं मिला।

यह भी कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन ही शिवलिंग विभिन्न 64 जगहों पर प्रकट हुए थे। उनमें से हमें केवल 12 जगह का नाम पता है। इन्हें हम 12 ज्योतिर्लिंग कहते हैं। महाशिवरात्रि के दिन उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में लोग दीपस्तंभ लगाते हैं। शिवलिंग की ऊंचाई तक के दीपस्तंभ लगाते हैं। दीपस्तंभ इसलिए लगाए जाते हैं ताकि लोग शिवजी के अग्नि वाले अनंत लिंग का अनुभव कर सकें। यह जो मूर्ति है उसका नाम लिंगोभव, यानी जो लिंग से प्रकट हुए थे। ऐसा लिंग जिसकी न शुरुआत थी और न ही अंत था। जो अनादि और अनंत था।

महाशिवरात्रि को पूरी रात लोग जागरण करते हैं। शिवलिंग पर बेलपत्र और दूध चढ़ाते हैं। भावविभोर होकर लोग शिवजी की शादी का उत्सव मना रहे होते हैं। महाशिवरात्रि को शिवजी के साथ शक्ति की शादी हुई थी। इसी दिन शिवजी ने वैराग्य जीवन छोड़कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। शिव जो वैरागी थी, वह गृहस्थ बन गए। माना जाता है कि शिवरात्रि के 15 दिन पश्चात होली का त्योहार मनाने के पीछे एक कारण यह भी है।

source https://navbharattimes.indiatimes.com/

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